जमाना याद है जब खेला करता था
तेरे आँचल से लुक्का छिप्पी,
तेरे आँचल से लुक्का छिप्पी,
लेकिन अब जमाना है
जमाना खेलता है
मेरे लंगोट से लुक्का छिप्पी!
में भी चला था आशियाने के उन्माद से,
फलक को चीरने के उन्माद से !
मगर जमाने ने किये अरमान तार-तार!
इन्तजात है उस सहर की,
जब मेरे पुरे होंगे अरमान!!
wait for the updation...
Accha Likha Hai !!!!
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