Friday, March 26, 2010

लुक्का छिप्पी

जमाना याद है जब खेला करता था
तेरे आँचल से लुक्का छिप्पी,

लेकिन अब जमाना है
जमाना खेलता है
मेरे लंगोट से लुक्का छिप्पी!

में भी चला था आशियाने के उन्माद से,
फलक को चीरने के उन्माद से !


मगर जमाने ने किये अरमान तार-तार!
इन्तजात है उस सहर की,
जब मेरे पुरे होंगे अरमान!!







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