Wednesday, September 1, 2010

अवारा मन


अरमान हो तुम उस सावन की तरह
रिमझिम सी बुत हो मेरे अरमानों की


सहलाती है तेरी खुश्बू मेरे मन को
रूह को छूती है तेरी उर्दू भरी अलफ़ाज़


रात की ओट में आना जाना है तेरा
झांकना मेरे सपनो में अदा है तेरी


कुछ लम्हों की झलक तेरे हुस्न का
लगता है जैसे फिजाओं में मंजर हो सदियो से


शरारत मेरी निगाहों का नही,शरारा तेरे जिस्म का
जुर्म मेरा नही, खता खुदा की है


पनाह की गुजारिश है तेरे प्यार में
हुस्न और इश्क का दीदार चाहता हूँ


जो फ़साना
कहा
नही इन लब्जों से
कहा है हर दफा वो इन निगाहों से


तमन्ना है उस कायनात के रात की
जब सासों की मिलन तेरे मेरे बीच होगी !!