Wednesday, June 16, 2010

जिंदगी की आस...

आड़ी-टेढ़ी है जिंदगी की पगडंडी मेरी |
चला जा रहा हूँ जिंदगी की आस में |

जिद्द है उड़ने की इस ख़ुले आसमान में |
लेकिन जिंदगी को जिंदगी से कोई आस नही |

बचाता फिर रहा हूँ इस रूठे वक़्त से अपने दामन को|
लेकिन रोंदे जा रहा है जिंदगी के दामन को |

किस्मत ने किये है जिंदगी को तार -तार |
अब तो पता नही चलता कितने है घाव |

किस्मत को कौंसना भी अब कम पड़ता है |
लेकिन ज़िदा हूँ अभी,जिंदगी की आस में ||